सौन्दर्य लहरी – आचार्य शंकर

सौन्दर्य लहरी संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है सौन्दर्य-लहरी में। आचार्य शंकर की इस अप्रतिम कृति के अनेकों अनुवाद विभिन्न भाषाओं में हो चुके हैं। भक्तों, साधकों, योगियों, तांत्रिकों एव साहित्य साधकों – सर्व के लिए सर्व गुणयुक्त कृति है यह। उपासना, भक्ति, माधुर्य, रीति, प्रीति, तंत्र, मंत्र, आचार, संस्कार, दर्शन एवं साहित्य- एक साथ विरल संयुक्त हैं सौन्दर्य लहरी में।

सच्चा शरणम् पर आचार्य शंकर की सौन्दर्य लहरी का सौन्दर्य हिन्दी भाषा में बिखरा पड़ा है। एक छोटे बालक की ढिठाई है इसमें, ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ वाला प्रयास है यह, पर भगवती की कृपा शेष शंकर के अमोघ बल से यह कार्य संभव हुआ है। इसमें कविताई न आ सकी है, न विद्वता का कोई पुट परन्तु शंकर एवं पार्वती की स्तुति का शिखर-लक्ष्य तो पा ही लिया है अनुवादक ने। सौन्दर्य लहरी के स्तोत्रों का हिन्दी भावानुवाद सच्चा शरणम् पर निरन्तर प्रकाशित होकर पूर्ण हो चुका है और ब्लॉग पर उपलब्ध है।

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