शैलबाला शतक (1-20)

Mother Goddessजीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है। मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है शैलबाला शतक! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी। अभाव-कुभाव-दुर्भाव में विक्षिप्त स्वभाव को शैलबाला के बिना कहाँ से सम्बल मिलता! इसलिए सहज वाणी में सहज प्रवाह को सरस्वती की सनकार मिली! अपनी लोकभाषा में माँ का स्तवन-वन्दन-आत्मनिवेदन और समर्पण का जो ज्वार उमड़ा वह थमने का नाम नहीं ले रहा था। कहीं कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई दिखावट नहीं..बस बिछ गया तो बिछ गया अपनी माई के चरणॊं में। जैसे हर पंक्ति आशीर्वाद होती गयी और माँ की वन्दना से निहाल होते गये बाबूजी। अपने से अपनी बात का यह सहज स्वाभाविक उच्छलन ही है शैलबाला शतक।

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निर्वाण षटकम् : आचार्य शंकर

आचार्य शंकर की विशिष्ट कृति सौन्दर्य लहरी के पठन क्रम में एक अन्य स्तोत्र-रचना निर्वाण षटकम् से साक्षात हुआ था। सहज और सरल प्रवाहपूर्ण संस्कृत ने इस रचना में निमग्न कर दिया था मुझे। बस पढ़ने के लिए ही हिन्दी में लिखे गए इसके अर्थों को थोड़ी सजावट देकर आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। शिवरात्रि से सुन्दर अवसर और क्या होगा इस प्रस्तुति के लिए। आचार्य शंकर और शिव-शंकर दोनों के चरणों में प्रणति!


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Virtue: George Herbert (Hindi Translation)

Virtue: George Herbert (Original Text)

SWEET day, so cool, so calm, so bright!
The bridal of the earth and sky-
The dew shall weep thy fall to-night;
For thou must die.

Sweet rose, whose hue angry and brave
Bids the rash gazer wipe his eye,
Thy root is ever in its grave,
And thou must die.

Sweet spring, full of sweet days and roses,
A box where sweets compacted lie,
My music shows ye have your closes,
And all must die.

Only a sweet and virtuous soul,
Like season’d timber, never gives;
But though the whole world turn to coal,
Then chiefly lives.

वर्च्यू: जॉर्ज हरबर्ट (हिन्दी अनुवाद)

अहह मधुर अति सौम्य शांत ज्योतिर्मय वासर!
एकतान कर रहे रूपमय अवनी अम्बर ।
किंतु जोहती पतन तुम्हारा रजनी क्षण-क्षण
मर जाओगे, विलख उठेंगे ढुलक अश्रु-कण ॥

राग रंग-मय मधुर गुलाब सुमन चटकीले
चकाचौंध कर देते दर्शक-लोचन गीले ।
किंतु सतत भूतल में तेरी जड़ें गड़ी हैं
सर पर तुम्हें निगल जाने को मृत्यु खड़ी है ॥

सरस गुलाब-सुमन दिन थाती ले रसवंती
अहह मधुरतम मनोहारिणी ऋतु-वासन्ती।
री! रसाल, मेरे गीतों ने यह जाना है
ऋतु-मधु-कोष-पीठ ! तुमको भी मर जाना है ॥

मात्र गुणमयी मधुर आत्मा का ही सरगम
होता कभीं विनष्ट न सदाबहार काष्ठ सम ।
जलकर राख अखिल जग जिस दिन हो जाता है
उस दिन भी गुणमय जीवन जीता-गाता है ॥

The Canonization: John Donne (Hindi Translation)

The Canonization: John Donne (Original Text)

FOR God’s sake hold your tongue, and let me love ;
Or chide my palsy, or my gout ;
My five gray hairs, or ruin’d fortune flout ;
With wealth your state, your mind with arts improve ;
Take you a course, get you a place,
Observe his Honour, or his Grace ;
Or the king’s real, or his stamp’d face
Contemplate ; what you will, approve,
So you will let me love.

Alas ! alas ! who’s injured by my love?
What merchant’s ships have my sighs drown’d?
Who says my tears have overflow’d his ground?
When did my colds a forward spring remove?
When did the heats which my veins fill
Add one more to the plaguy bill?
Soldiers find wars, and lawyers find out still
Litigious men, which quarrels move,
Though she and I do love.

Call’s what you will, we are made such by love ;
Call her one, me another fly,
We’re tapers too, and at our own cost die,
And we in us find th’ eagle and the dove.
The phoenix riddle hath more wit
By us ; we two being one, are it ;
So, to one neutral thing both sexes fit.
We die and rise the same, and prove
Mysterious by this love.

We can die by it, if not live by love,
And if unfit for tomb or hearse
Our legend be, it will be fit for verse ;
And if no piece of chronicle we prove,
We’ll build in sonnets pretty rooms ;
As well a well-wrought urn becomes
The greatest ashes, as half-acre tombs,
And by these hymns, all shall approve
Us canonized for love ;

And thus invoke us, “You, whom reverend love
Made one another’s hermitage ;
You, to whom love was peace, that now is rage ;
Who did the whole world’s soul contract, and drove
Into the glasses of your eyes ;
So made such mirrors, and such spies,
That they did all to you epitomize—
Countries, towns, courts beg from above
A pattern of your love.”

द कैनोनाइजेशन: जॉन डन (हिन्दी अनुवाद)

परमेश्वर के लिये मौन अपनी रसना रहने दो
मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो ।

लकवा गठिया-सी मेरी गति को चाहे धिक्कारो
या मेरा खल्वाट भाल मेरा दुर्भाग्य निहारो
बनी रहो तुम पर समृद्धिमय विलसे बुद्धि कलामय
नित्य प्रगतिमय रहो तुम्हारा रहे स्थान गरिमामय
प्रेम करे सम्मानित तुमको करे गौरवान्वित नित
अथवा मग्न रहो अनुचिन्तन कर मुख चुम्बन विजड़ित
जैसा चाहो वैसे ही भावों से मन भरने दो
मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो।

कौन हो गया घायल मेरे झेल प्रेम के फेरे
किस व्यवसायी की नौका डूबी आहों से मेरे
मेरे आंसू की धारा से किसकी बही धरा है
कब मम उर उष्मा से रोगी हो प्लेगार्त मरा है
सेनानी रण खोज खोज कर निरत युद्ध में नित हैं
न्यायिक खोज रहा नित उसको जो जन दोषान्वित हैं
नहीं कहीं संघर्ष, प्रेम फिर हममें से झरने दो
मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो।

कोई दे दो नाम हमें जो भी तेरा मन चाहे
वैसी ही तो विरच गयी है हमें प्रेम की बाहें
कहो उसे मधुमाखी मैं हूँ एक अपर मधुमाखी
दीपशिखा हम ज्वलित बुझेंगे साथ प्राण की साखी
ईगल डोव चील बतखी सम एक एक में डूबे
फोयनिक्स पौराणिक खग के पूर्ण यही मंसूबे
(बिना युग्म के उसी रूप में होता पुनः प्रकट है
जग में एकमात्र यह खग जब आती मृत्यु निकट है)
मिलित एक लिंगी, मृत जीवित यह रहस्य धरने दो
मुझे प्रेम करने दो केवल मुझे प्रेम करने दो।

मर सकते हम इसमें, इसमें भले नहीं जी पाये
यदि समाधि स्मारक गाथा कोई न हमें मिल पाये
फिर भी गीतों बीच सुसज्जित होगा प्रेम हमारा
भले शान्ति इतिहास ग्रंथ-सम हो न सिद्ध बेचारा
किन्तु चतुर्दशपदी बीच में इसका पद स्थापित है
यही महत्तम राख, न आधी भी समाधि पूजित है
इन मंत्रों से सर्वसिद्ध बन सन्त प्रेम ढरने दो
हमें प्रेम करने दो, केवल हमें प्रेम करने दो।

पुनः पुकारेंगे हमको सम्मानित स्वर में सारे
शीश झुकायेंगे आ पावन प्रेम कुटी के द्वारे
कभीं तुम्हें था प्रेम शान्ति, पर आज वही पीड़ा है
अखिल विश्व के आत्माकर्षण की करती क्रीड़ा है
सबकी आत्मा खिंच तेरे दृग-दर्पण बीच समाई
प्रेम प्रतीक सदृश खोजी इसकी स्मृति जग में छाई
देश नगर नृप माँग रहे यह प्रीति रीति चरने दो
हमें प्रेम करने दो केवल हमें प्रेम करने दो ।

कवि समय: वृक्ष दोहद: पुष्प-वृक्ष चर्चा

कवि समय

Kavi Samay

साहित्य के अन्तर्गत ’कवि-समय’ का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ ’वृक्ष-दोहद’ का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी। वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है। यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष के साथ इस दोहद का प्रयोग फूलों के उद्गम के अर्थ में ही किया जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ’हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में कवि-प्रसिद्धियों के अन्तर्गत वृक्ष-दोहद का सुन्दर विवेचन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ’दोहद’ शब्द ’दौहृद’ शब्द का, प्राकृत रूप है जिसका अर्थ भी मिलता जुलता है। दोहद के सम्बन्ध में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि “कुशल व्यक्तियों द्वारा वृक्षों-लताओं आदि में जिन पदार्थों और क्रियाओं से असमय, अऋतु में ही फूलों का उदगम करा दिया जाता है, उसे दोहद कहते हैं।” यह वृक्ष दोहद मेरे लिये एक विचित्र चीज है। साहित्य और शिल्प में वर्णित, निर्मित यह वृक्ष-दोहद रोचक जान पड़ता है। संस्कृत काव्य में यथास्थान वृक्ष दोहदों का उल्लेख है। कालिदास के ग्रंथों, मल्लिनाथ के ग्रंथ, काव्य-मीमांसा व साहित्य दर्पण आदि शास्त्रीय ग्रंथों में इस वृक्ष दोहद का पर्याप्त उल्लेख है।

यूँ तो इन ग्रंथों में अशोक, बकुल, तिलक, कुरबक- इन चार ही वृक्षों से सम्बन्धित कवि-प्रसिद्धियाँ मिलती हैं, परन्तु अन्यत्र कुछ स्थानों पर कर्णिकार (अमलतास), चंपक (चंपा), नमेरु(सुरपुन्नाग), प्रियंगु, मंदार, आम आदि वृक्ष-पुष्पों के भी स्त्री-क्रियायों से उदगमित होने के उल्लेख हैं। मेरी रुचि अचानक ही इन वृक्षों के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने की तरफ हो गयी, और अपने आस-पास इनमें से कुछ वृक्षों को देखकर मन कल्पनाजनित वही दृश्य देखने लगा जिनमें सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के फूल खिल रहे हों,अमलतास स्त्रियों के नृत्य से पुष्पित हो रहा हो, स्त्रियों की गलबहियाँ से कुरबक हँस कर खिल गया हो, चंपा फूल गया हो स्त्रियों की हँसी से चहककर, गुनगुना रही हों स्त्रियाँ और विकसित हो गया हो नमेरु, छूने भर से विकसित हुआ हो प्रियंगु और कुछ कहने भर से स्त्रियों के फूल गया हो मंदार आदि-आदि।


हजारी प्रसाद द्विवेदी: हिन्दी साहित्य की भूमिका

“यद्यपि यक्षों और नागों के देवता कुबेर,सोम, अप्सरस और अधिदेवता वरुण दिग्पाल के रूप में ब्राह्मण ग्रंथों में स्वीकृत हो चुके थे, पर बाद के साहित्य में यक्ष और यक्षिणी अपदेवता समझे जाने लगे थे। उनका पुराना पद (जल और वृक्षों का अधिपतित्व) किसी न किसी रूप में महाभारत में स्वीकृत है। महाभारत में ऐसी अनेक कथायें आती हैं जिनमें सन्तानार्थिनी स्त्रियाँ वृक्षों के उपदेवता यक्षों के पास संतान कामना से जाती थीं। वस्तुतः यक्ष और यक्षिणी मूलरूप से उर्वरता के ही देवता थे। भरहुत, मथुरा, बोध गया, साँची आदि में संतानार्थिनी स्त्रियों के यक्षों के पास जाकर वर प्राप्त करने की मूर्तियाँ बहुत अधिक मात्रा में पायी गयीं हैं। इन वृक्षों के पास अंकित स्त्रियाँ प्रायः नग्न हैं।”


इन वृक्षों और फूलों के सम्बन्ध में तलाशने निकला इस अन्तर्जाल पर। जो कुछ मिला वह इस कवि-समय से ताल्लुक तो नहीं रखता था, परन्तु काफी ज्ञानवर्द्धन करने के लिये पर्याप्त था। इन वृक्ष-पुष्पों के वानस्पतिक नामों की खोज ने तो और भी बहुत कुछ हाथ पकड़ा दिया। तो एक भाव मन में जागा। इन वृक्षों और पुष्पों को एक आत्मीय भाव से निरखते हुए इनकी परिचयात्मक चर्चा करूँ, यदि संभव हो तो शास्त्रीय और वैज्ञानिक सन्दर्भों के साथ। सब कुछ इसी अन्तर्जाल और संकलित पुस्तकों की सामग्री का ही प्रस्तुतिकरण होगा- मेरा अपना कुछ नहीं।

Why Literature: Mario Vargas Llosa

 icon-bell-o प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख ‘The Premature Obituary of The Book’का हिन्दी रूपान्तर। ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं। साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख। साहित्य की ज़रूरत क्यों?(Why Literature ?) इस सहज, साधारण परन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न का प्रशंसनीय विवेचन है इस आलेख में।

The Premature Obituary of The Book : Mario Vargas Llosa

पुस्तक मेलों या पुस्तक की दुकानों पर प्रायः ऐसा होता रहता है कि कोई सज्जन व्यक्ति मेरे पास आता है और मुझसे हस्ताक्षर की बात करता है, और कहता है, “यह मेरी पत्नी के लिए है, मेरी छोटी लड़की के लिए है या मेरी माँ के लिए है ।” वह इसे स्पष्ट करते हुए कहता है कि वह बहुत बड़ी पढ़ने वाली है और साहित्य से प्रेम करती है । मैं तुरंत पूछ बैठता हूँ, “और तुम्हारी अपने बारे में क्या स्थिति है? क्या तुम्हें पढ़ना पसन्द नहीं है?” एक ही तरह का उत्तर प्रायः मिला करता है, “वास्तव में मुझे पढ़ना पसन्द है किन्तु मैं बहुत व्यस्त आदमी हूँ।” दर्जनों बार मैंने ऐसा स्पष्टीकरण सुना है। यह आदमी और इसी तरह के हजारॊ आदमी ऐसे हैं जिन्हें अनेकों महत्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनकी अनेकों प्रतिबद्धताएँ हैं, अनेकों उत्तरदायित्व हैं और वे अपना मूल्यवान समय किसी उपन्यास में सिर गड़ा कर, कोई कविता की किताब पढ़ते हुए या घंटों-घंटों साहित्यिक लेख पढ़ते हुए नष्ट नहीं करना चाहते हैं । इस व्यापक विचारधारा के अनुसार साहित्य एक गौण क्रिया-कलाप है । निःसन्देह आनन्ददायक और लाभदायक है जो संवेदनाएं और अच्छे रंग-ढंग प्रदान करता है, लेकिन वास्तव में यह एक मनोरंजन है, एक प्यारा मनोरंजन है जिसे आदमी केवल मनोरंजन के लिए ही प्रयोग में लाने पर समय दे सकता है । यह कुछ ऐसी चीज है जो खेलों, चलचित्रों, ताश या शतरंज के खेल के बीच में बैठाई जा सकती है, और बिना सिर खपाए इसको बलिदान कर दिया जा सकता है जब जीवन के संघर्ष में कोई कार्य या कोई ड्यूटी “प्राथमिकता” के रूप में अनिवार्य रूप से सामने आ जाती हो।

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नल दमयंती (नाटक)

 icon-bell-o नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी (नेपथ्य में)। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी।

प्रथम दृश्य

(राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद के लिए प्रस्तुत होते हैं। कुलगुरु को प्रणाम करते हैं।)

कुलगुरु: कल्याण हो राजन्‌! हे प्रजापालक! जो राजा, गुरु एवं श्रेष्ठजनों को आदर-सम्मान करता है, समकक्षी राजाओं को यथोचित स्थान देता है और प्रजा को पुत्रवत स्नेह करता है, उसका राज सदा ही निष्कंटक और चिरस्थायी होता है।

नल: आशीष दें कुलगुरु! आपके आशीर्वचनों का अक्षरशः पालन कर सकूँ और मेरे मन मन्दिर में ले रही कल्पना की मूर्ति चिरस्थायी हो सके।

कुलगुरु: जाओ राजन्‌! तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। स्वयंवर में उपस्थित राजा-राजकुमार तुम्हारे तेज से वैसे ही प्रतिहत हो जायेंगे जैसे कि सूर्य की तेजोमय रश्मियों से तारे। विजयी भवः राजन! विजयी भव:।

(नल प्रणाम करता है। पर्दा गिरता है।)

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सावित्री (नाटक)

icon-bell-oयह प्रस्तुति सावित्री के उस स्वयंवर को रेखांकित कराने व स्मरण कराने का भी एक प्रयास है जो सही अर्थों में स्वयंवर कहे जाने योग्य है। सावित्री का यह सम्मानित कथानक स्वयंवर को नवीन अर्थ देने वाला है। उस युग और संप्रति वर्तमान युग का भी अकेला उदाहरण। स्वयंवर का तो यथार्थतः अर्थ ही है न, स्वयं का वर- “स्वयं वरतीति स्वयंवरः”; अर्थात् कन्या अपने वर का स्वयं वरण करती है। किन्तु क्या इतिहास का कोई भी स्वयंवर केवल कन्या की इच्छा के साथ सम्पन्न हुआ है? पिता की आज्ञा व इच्छा सिर चढ़कर बोलती है। प्रतियोगिताओं का आयोजन, सामर्थ्य का प्रदर्शन, क्षमताओं का आँकलन – यह सब अप्रत्यक्षतः कन्या की इच्छाओं के अस्वीकार के दुष्चक्र ही तो हैं। अस्वीकार हो भी तो अन्ततः स्वीकार करना पड़ता है कन्या को। जानकी का पछताना स्मरण करें- “अहह तात दारुण हठ ठानी/ समझत नहिं कछु लाभ न हानी।” किन्तु सावित्री का स्वयंवर अनोखा है। वह भाग कर नहीं, त्याग कर नहीं, हठ कर नहीं, रूठ कर नहीं बल्कि गुरुजनानुमोदित विधि से स्वयं पति को चुनने निकल पड़ती है और चयन भी ऐसा कि काल को भी हथजोड़ी करनी पड़ती है। नारी महिमा मंडित होती है। यह नाट्य प्रस्तुति भी इसलिए ही की नारी की महानता स्मरण रहे। उसकी भावनाओं का समादर हो और जो रमणी संशय, शंका, सोच, शोक और संकोच में घुटती रहती है, उसके द्रुत विलंबित क्षण को शिखरणी बना दिया जाय। प्रविष्टि इसलिए भी कि यह प्रहणीय हो, मननीय हो और धारणीय हो।

प्रथम दृश्य

(मद्र नरेश अश्वपति का राजभवन। राजा रानी वार्तालाप करते हुए)

महारानी: मेरे छत्रपति! हदय वल्लभ! मेरी जीभ पर हमेशा स्पंदित होता है सावित्री नाम रूपी आनंद। मालव नरेश की कन्या अपने किस सुकृत की सराहना करूँ कि सविता शक्ति ने अपने वर से मुझे महनीया माँ बना दिया है। ऐसी सावित्री सुपुत्री की जननी बनने का सौभाग्य दिया है। स्मरण है प्रिय! जब हम अष्टादश वर्ष यावत तपोनिरत थे तो तपोम्लान हमारे मुख पर कोई बाँसुरी रख गया। उस मुहूर्त में मेरा मुख रक्त पलाशवर्णी हो गया था। काया अक्लांत हो गयी, माधुर्यपूर्ण रोमांच से खुल गयीं मेरी आत्मा की आँखे। आश्चर्य शिथिल हो गयी मैं। स्मरण है न?

महाराज: हाँ, हाँ, प्रिये! सूर्यसुता यमुना की सारूप्यता विशद वारिवाहिनी गंगा की विमलता और त्रिभुवन विजयिनी सरस्वती की स्वरमयी सरसता-इन तीनों रसों की संपृक्त त्रिवेणी सावित्री को देवी ने हमें पुत्री के रूप में प्रदान किया है। उस क्षण की रोमांच लहर से तो मैं आकाश तक विस्तृत हो गया। अधर काँप उठे। हृदय लोक में असंख्य आकांक्षाओं के नक्षत्र जगमगा उठे। मैंने आँसुओं से कृतज्ञता ज्ञापित की।

महारानी: सविता शक्ति ने कहा था न, मत रो! मैं स्वयं को तेरी सुता में समाहित कर उसी में लीन हो गयी हूँ।सत्य ही मेरे नाथ! उस बालिका के स्नेह में अब डूब जाने पर भीति का कीचड़ धोकर पवित्र हो गया है मेरा मन।

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राजा हरिश्चन्द्र

[block type=”rounded” color=”#FFF” background=”#322662″]इस ब्लॉग पर करुणावतार बुद्ध नामक नाट्य-प्रविष्टियाँ मेरे प्रिय और प्रेरक चरित्रों के जीवन-कर्म आदि को आधार बनाकर लघु-नाटिकाएँ प्रस्तुत करने का प्रारंभिक प्रयास थीं । यद्यपि अभी भी अवसर बना तो बुद्ध के जीवन की अन्यान्य घटनाओं को समेटते हुए कुछ और प्रविष्टियाँ प्रस्तुत करने की इच्छा है । बुद्ध के साथ ही अन्य चरित्रों का सहज आकर्षण इन पर लिखी जाने वाली प्रविष्टियों का हेतु बना और इन व्यक्तित्वों का चरित्र-उद्घाटन करतीं अनेकानेन नाट्य-प्रविष्टियाँ लिख दी गयीं । नाट्य-प्रस्तुतियों के इसी क्रम में अब प्रस्तुत है अनुकरणीय चरित्र ’राजा हरिश्चन्द्र’ पर लिखी प्रविष्टियाँ। सिमटती हुई श्रद्धा, पद-मर्दित विश्वास एवं क्षीण होते सत्याचरण वाले इस समाज के लिए सत्य हरिश्चन्द्र का चरित्र-अवगाहन प्रासंगिक भी है और आवश्यक भी। ऐसे चरित्र दिग्भ्रमित मानवता के उत्थान का साक्षी बनकर, शाश्वत मूल्यों की थाती लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं और पुकार उठते हैं-’असतो मां सद्गमय’।[/block]

राजा हरिश्चन्द्र

प्रथम दृश्य

(देवेन्द्र का दरबार। पारिजात पुष्पों से सुसज्जित सिंहासन। देवगण पुष्प बरसा रहे हैं, परिकर यशोगान कर रहे हैं, अप्सरायें नृत्य कर रहीं हैं। सहसा द्वारपाल प्रवेश करता है।)

द्वारपाल: राजाधिराज! देवर्षि नारद प्रवेश कर रहे हैं।
इन्द्र: सादर लाओ, मैं ऋषिवर का दर्शन कर लोचन कृतार्थ करूँ।
द्वारपाल: यथाज्ञापयतु !

(दिव्य शरीर नारद का प्रवेश। करतल वीणा पर नारायण-नारायण का मधुर स्वर झंकृत है।)

इन्द्र: (हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए सिंहासन से उठ खड़े होते हैं) आइये देवर्षि! मेरा परम सौभाग्य है कि आपके पद-पद्म अमरावती में पधारे। आसन ग्रहण करें देवर्षि!

नारद: देवाधिपति! परिभ्रमण तो अपना स्वभाव ही है, परिक्रमा अपनी दिनचर्या है, चरैवेति-चरैवेति जीवन-मंत्र है। स्थिरता तो मरण में है, जीवन में कहाँ! चलना ही केवल चलना है, जीवन चलता ही रहता है।
इन्द्र: आप कृपालु हैं। मैं कृतकृत्य हुआ। कहाँ से आना हो रहा है? उत्सुक हूँ कि श्रीमुख से कुछ सुनूँ।

नारद: अभी तो धराधाम से चला हूँ। ब्रह्मलोक जाने का मन था, सुरपुर की संगीतमय लहरी सुन ठिठक गया। ऐसा ही रुचिर ऋतुराज लेकर काम हिमगिरि पर मुझे स्खलित करने गया था। हरि इच्छा। वही स्मृति हुई। आपसे मिलने आ गया। हूँ तो मैं स्वर्ग लोक में पर मन बँधा है मृतलोक में ही। इन्द्र! मानव भी कितना गरिमामय है।

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करुणावतार बुद्ध

[block type=”rounded” color=”#FFF” background=”#329491″]कुछ चरित्र हैं जो बार-बार दस्तक देते हैं, हर वक्त सजग खड़े होते हैं मानवता की चेतना का संस्कार करने हेतु। पुराने पन्नों में अनेकों बार अनेकों तरह से उद्धृत होकर पुनः-पुनः नवीन ढंग से लिखे जाने को प्रेरित करते हैं। इनकी अमित आभा धरती को आलोकित करती है, और ज्ञान का प्रदीप उसी से सम्पन्न होकर युगों-युगों तक मानवता का कल्याण करता रहता है । करुणावतार बुद्ध के ऐसे ही महानतम चरित्र को उद्घाटित करती यह नाट्य-रचना प्रस्तुत हैं।[/block]

करुणावतार बुद्ध

प्रथम दृश्य

(प्रातःकाल की बेला । महल में राजा और रानी चिन्तित मुद्रा में)

शुद्धोधन: सौभाग्यवती ! कल अरुणोदय की बेला थी । अभी अलसाई आखों से नींद विदा हुई नहीं थी । मैं अपलक निहार रहा था भरी-पूरी देहयष्टि वाले अपने राजदुलारे को । प्रासाद के एक एकांत कोने में वह अनमना बुदबुदाते हुए घूम रहा था । मुखमण्डल बता रहा था, वह सारी रात सोया नहीं है। उसके विद्युम से अरुण अधरों से कढ़े अप्रासंगिक बोल को मैं सुन रहा था -

“नभ से उतरो कल्याणी किरणों! हमारा देय शंखजल स्वीकारो। हमारे शेष प्रश्न को अशेष कर दो। लौटो ओ सम्यक दिन। लौटो, हमारी मृत चेतनाओं को धूपाभिषित कर दो। जी चुका मैं भूत। अशेष करना है हमें यह आज का संघर्ष ताकि अनागत विश्व का यश बन जाये। हम देहजीवी नहीं दृष्टि-जीवी हैं। मेरी उदासी भरी जीवन की उषा को उत्सवगर्भा बना दो।”

रानी: हे राजाधिराज! क्यों कह रहा था सिद्धार्थ यह सब? यह अबूझ पहेली कैसी? कौन-सी उदासी? कौन-सा उत्सव? कौन-सा शेष प्रश्न? कैसा सम्यक दिन? क्या देव शंखजल?

शुद्धोधन: सुमुखि! यही तो अपनी आकुलता है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है, उस पुत्र का क्या है उद्वेग? कलेजे पर हाथ रख कर वह कह रहा था-

“देश का, न काल का-मैं किसी का ताबेदार नहीं । जिन्हें तुम अपना समझते हो, जिन्हें तुम अपनी पहचान बताते हो, जिन्हें तुम प्रतीकों की तरह उठाये-उठाये देश और काल में सदियों से चल रहे हो, क्या तुम इन्हें उठाकर एक किनारे नहीं रख सकते ? चलो, मेरी प्रार्थना ! अब सृष्टि-सुख की भाषा बनकर चलो ! मुझे अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा, लौटना ही होगा।”

Continue reading करुणावतार बुद्ध