Stray Birds by R.N. Tagore: Hindi Translation #3

Hindi Translation of Stray Birds

स्ट्रे बर्ड्स (Stray Birds) गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की लघु सूक्ति कविताओं (Quotation poems) की अद्भुत पुस्तक है। सूक्ति कविताओं (Quotation poems) की यह पुस्तक यद्यपि छोटी है, परन्तु विलक्षण विराट है। कुछ प्रविष्टियों में यह पुस्तकानुवाद पूर्ण होगा। पहली एवं दूसरी कड़ी में कुल 22 सूक्तियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

Original Text of Stray Birds

23. God is ashamed when the prosperous boast His special favour.

24. The hills are like shouts of children who raise their arms trying to catch stars.

25. I cast my own shadow upon my path, because I have a lamp that has not been lighted.

26. The reed is lonely in its crowd for it is not loved.

27. the power that boasts of its mischief is laughed at by the yellow leaves that fall and clouds that pass by.

28. The mind sharp but not broad sticks at every point but does not move.

29. Never be afraid of the moments-thus sings the voice of the everlasting.

30. What is this unseen flame of dark whose are the stars?

31. The earth hums to me today in the sun like a woman of her spring, some ballad of the ancient time in a forgotten tone.

32. Dream is a wife who must talk, sleep is a husband who silently suffers.

33. The night kisses the fading day whispering to his ear, “I am death, your mother. I am to give you fresh birth.”

Hindi Translation of Stray Birds

23. ईश विशेष पक्षधर मेरा कहता वाग् विलासी/ सुन यह डींग विलज्जित होता ईश्वर घट-घट वासी।

24. लगती है पहाड़ियाँ जैसे बच्चों की किलकारी/ यथा उन्होंने उडु करस्थ करने को बाँह पसारी।

25. मैं अंकित करता जाता हूँ पथ पर अपनी छाया। क्योंकि प्रदीप पास जो मेरे उसको नहीं जलाया।

26. अपने भीड़ भरे आँगन में नरकट खड़ा अकेला/ क्योंकि किसी ने नहीं प्रीति-घट उस पर हाय उड़ेला।

27. जो निज अहमिति बल विकृति की डींग हाकते जाते/ पीत पतित तृण प्रस्थानित घन उसकी हँसी उड़ाते।

28. जो मस्तिष्क तीक्ष्ण तो है पर अविशद ही रह जाता/ जात चिपक कहीं पर भी पर गतिशीलता न पाता।

29. निर्भय रहो क्षणों को मानो कभीं नहीं भयदाता/ जो अनन्त है उसका स्वर ऐसा संगीत सुनाता।

30. क्या है यह तम – लौ न सूझती है जो आँख पसारे। निकल गर्भ से जिसके चमकें नभ में झिलमिल तारे।

31. धरणी निज वसंत तरुणी सम रवि द्युति आज नहाती। कोई गाता विगत काल की मुझसे गुनगुन गाती।

32. सपना पत्नी जिसकी निश्चित बहती वाणी-धारा/ निद्रा वह पति जो अवश्य चुप सब झेलता बिचारा।

Stray Birds by Rabindra Nath Tagore: Hindi Translation

stray-birds

प्रस्तुत है गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुस्तक स्ट्रे बर्ड्स (Stray Birds) का हिन्दी अनुवाद। स्ट्रे बर्ड्स टैगोर की लघु सूक्ति कविताओं की अद्भुत पुस्तक है। यद्यपि छोटी है, परन्तु विलक्षण विराट है। 11 सूक्तियाँ पिछली प्रविष्टि में आ चुकी हैं। इसी प्रकार अगली कुछ प्रविष्टियों में यह पुस्तकानुवाद पूर्ण होगा।

Original Text of Stray Birds

12. The mist like love plays upon the heart of the hills and brings out surprise of beauty.

13. We read the world wrong and say that it deceives.

14. Man barricades against himself.

15. He who wants to do good knocks at the gate, he who loves finds the gate open.

16. The artist is the lover of the Nature, therefore he is his slave and master.

17. In the darkness the one appears as uniform, in the light the one appear as manifold.

18. The great earth makes herself hospitable with the help of the grass.

19. The sadness of my soul is her bride’s Veil. It waits to be lifted in the night.

20. Roots are the branches down in the earth. Branches are roots in the air.

21. Do not insult your friend by lending him merits from your own pocket.

22. The echo mocks her origin to prove she is original.

Hindi Translation of Stray Birds

12. धुंध प्रेम सम है पहाड़ियों के उर पर इठलाता/ वह अद्भुत सुन्दरता का आश्चर्य सृजित कर जाता।

13. हम ऐसे हैं इस जग की करते हैं गलत पढ़ाई/ और यही कहते फ़िरते करता है जगत ठगाई।

14. नर भी कैसी चीज, कौन सी उसकी कहें बुलंदी/ वह अपने विरुद्ध ही विरचित करता घेराबन्दी।

15. शुभ करने की इच्छा वाला तो पट है खटकाता/ किन्तु प्रेम करने वाले को द्वार खुला मिला जाता।

16. कलाकार वह प्राणी है जो प्रकृत प्रेम पथगामी/ इसीलिए तो वह है उसका अनुचर उसका स्वामी।

17. एकाकार प्रकट होता है अंधकार में कोई/ कोई विविधाकार ज्योति में एकरूपता खोई।

18. शिरोधार्य कर निज दूर्वादल की सहायता न्यारी/ अति आतिथ्यकारिणी बनती है वसुन्धरा प्यारी।

19. उसके दुल्हन के घूँघट सी मेरी आत्म उदासी/ निशि में घूँघट हटे प्रतीक्षा में हैं आँखें प्यासी।

20. जड़ें धरणि में धँसी हुई हैं अधोगता शाखायें/ शाखायें जड़ हैं जो ऊपर पवन बीच लहरायें।

21. दे उधार निज निजी जेब से प्रतिभा का धन सारा। करो नहीं उसको अपमानित जो है सुहृद तुम्हारा।

22. स्वयं सत्य वास्तविक सिद्ध करने की खींचे रेखा/ उपहासित वास्तविक उत्स को करती प्रतिध्वनि देखा।

The premature obituary of the book : Why Literature – Mario Vargas Llosa

Mario Vargas llosa

पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) एक महत्वपूर्ण लैटिन अमेरिकी साहित्यकार हैं। इन्हें वर्ष 2010 में साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। लोसा का एक विशिष्ट निबन्ध है – पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book : Why literature)। इस निबन्ध में Mario Vargas Llosa साहित्य के सम्बन्ध में कई आम हो चली धारणाओं और इनके प्रभाव स्वरुप साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को रेखांकित करते हैं।

साहित्य को लेकर ऐसी ही एक धारणा यह बन चुकी है कि साहित्य के लिए समय और विलासिता दोनों महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। इस धारणा का कारण यह सोच है कि साहित्य भी मूलतः अन्य माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है अथवा मनोरंजन का माध्यम है। ऐसी सोच की प्रवृत्तियाँ समाज में साहित्य के प्रति उदासीनता का भाव निर्मित कर रही हैं। अधिकांशतः लोग पढ़ना नहीं चाहते हैं, उसके स्थान पर कोई तत्क्षण सुख देने वाली वस्तु में उलझना ज्यादा श्रेयस्कर समझते हैं।

Why Literature? by Mario Vargas Llosa

इस निबन्ध में Mario Vargas Llosa साहित्य को अवकाश के क्षणों में विलासिता की वस्तु के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हैं और इस पक्ष में तर्क देते हैंं कि साहित्य मस्तिष्क के क्रियाकलापों के लिए एक प्राथमिक और आवश्यक वस्तु है और आधुनिक प्रजातांत्रिक समाज, स्वतंत्र व्यक्तियों के समाज के लिए नागरिकों के निर्माण कार्य की एक ऐसी वस्तु है जिसे हटाया नहीं जा सकता है।

सच्चा शरणम् पर मारिओ वर्गास लोसा का यह महत्वपूर्ण निबन्ध कई प्रविष्टियों में प्रस्तुत हुआ है और हिन्दी रूपांतर के रूप में पूर्णतः उपलब्ध है। यह हिन्दी रूपांतर इस निबन्ध को हिन्दी पाठकों से परिचित करायेगा और लोसा की विशिष्ट चिन्तन धारा से साक्षात् करेगा।

Stray Birds by Tagore: Hindi Translation

Stray Bird

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर (R.N. Tagore) की सूक्ति कविताओं की पुस्तक स्ट्रे-बर्ड्स (Stray Birds) का हिन्दी अनुवाद मेरे ढूँढ़ने पर भी मुझे नहीं मिला, यद्यपि गुरुदेव की अन्य कई रचनाओं के हिन्दी अनुवाद पर्याप्त रूप से उपलब्ध हैं। गीतांजलि के काव्यानुवाद के क्रम में बाबूजी से मैंने गुरुदेव की इस अद्भुत सूक्ति कविताओं की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने के लिए भी प्रार्थना की थी। गीतांजलि का अनुवाद सच्चा शरणम् पर प्रकाशित है। यहाँ प्रस्तुत है स्ट्रे बर्ड्स का हिन्दी काव्यानुवाद।

Original Text of Stray Birds

1. The mystery of creation is like the darkness of night, it is great. Delusion (misleading) of knowledge are like the fog of the morning.

2. What you are you don’t see. What you see is your shadow.

3.That I exist is a perpetual surprises which is life.

4. O, Beauty, find thyself in love, not in the flattery of the mirror.

5. Do not blame your food because you have no appetite.

6. God finds himself by creating.

7. God says to man, “ I heal you therefore I hurt, love you therefore punish.”

8. Thank the flame for light, but don’t forget the lampholder standing in the shade with constancy of patience.

9. God grows weary of great kingdoms, but never of little flowers.

स्ट्रे बर्ड्स का हिन्दी भावानुवाद

१. सृष्टि रहस्य परम गरिमामय ज्यों निशि का अंधेरा।
अरुणोदयकालीन कुहासा सदृश ज्ञान-भ्रम तेरा॥

२. तुम हो कौन नहीं यह तेरे लोचन पथ में आया।
जो तुमको दर्शित होता है वह है तेरी छाया॥

३. यही कि मैं स्थित हूँ यह अविरत है आश्चर्य कहानी।
‘जीवन’ संज्ञा इसको ही देती आयी है वाणी॥

४. प्रेमालय में पैठ स्वयं को खोज वहीं सुघराई।
न कि चापलूसी दर्पण की दे जिस ठौर बधाई॥

५. किंचित दोष न दो उस भोजन को जो थाल परोसी।
सच में तेरी क्षुधा न जागी क्षुधा तुम्हारी दोषी॥

६. रचना करके ही अपने को परमेश्वर पा लेता।
संसृति रचना सर्व सर्वगत सर्व सदगुणोपेता॥

७. प्रभु कहते नर से हम पीड़ा हर तो देते पीड़ा।
तुमसे प्रेम इसी से तेरे साथ दंड की क्रीड़ा॥

८. धन्यवाद दो लौ को जिसकी द्युति में फिरते फूल।
पर ओटस्थित धैर्यधनी वह दीपकधर मत भूले॥

९. राजधानियों से विशाल प्रभु परेशान हो जाता।
लघु सुमनों से किन्तु कभीं ऊबता न सृष्टि-विधाता॥

गीतांजलि – रवीन्द्र नाथ टैगोर : हिन्दी भावानुवाद

गीतांजलि

गीतांजलि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की विशिष्ट काव्य-रचना है। यह मूलतः बांग्ला में लिखी गयी थी और कालान्तर में स्वयं गुरुदेव ने इस रचना का अंग्रेजी रूपान्तर किया। अंग्रेजी में प्रकाशित इस कृति ने भारतीय कविता को विश्वमंच पर विशिष्ट पहचान दी। इस रचना के लिए गुरुदेव रवीन्द्र को साहित्य के प्रतिष्ठित नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

टैगोर की इस कालजयी गीतांजलि के कुछ गीतों का गीतात्मक, काव्यात्मक भावानुवाद पिताजी श्री प्रेम नारायण पंकिल ने किया था, जो सच्चा शरणम् पर एक-एक कर प्रकाशित होता रहा है। इन गीतों के हिन्दी अनुवाद काव्यात्मक एवं गेय हैं, और इन गीतों में हिन्दी के मूल गीतों-सा रस व्याप्त है। गीतांजलि के गीतों का भाव ग्रहण करते हुए अपनी मौलिक प्रतिभा का विनिवेश भी किया है पिता जी ने और रम्य छन्दबद्ध अनुवाद प्रस्तुत किया है।

यद्यपि गीतांजलि के इन गीतों में अभी भी अधिकांश गीतों का अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ है, परन्तु निश्चित ही शेष अनुवाद भी क्रमशः प्रविष्टियों के रूप में सच्चा शरणम् पर आयेंगे। गुरुदेव के कई अन्य गीत भी अनुवाद के रूप में हिन्दी में अनुवाद कर प्रकाशित किये जाने की स्थिति में हैं।